Uttarakhand

हल्द्वानी रानीबाग की ये कहानी आपके होश उड़ा देगी

उत्तरायणी मेला उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख लोक उत्सव है, जो विशेष रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। यह मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होता है और एक सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यावसायिक आयोजन है।

मेले की मुख्य विशेषताएं:

इतिहास और महत्व:

 

उत्तराखण्ड राज्य में जियारानी की गुफा के बारे में एक कथा

किवदंती प्रचलित है कि कत्यूरी राजा पृथ्वीपाल उर्फ़ प्रीतमदेव की पत्नी रानीजिया यहां चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थीं। वह बेहद सुन्दर थी ही जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुंची तो वैसे ही आक्रांताओं की दुश्मन सेना ने वहां घेरा डाल दिया। जियारानी महान शिवभक्त और पवित्र पतिभक्त महिला थी। विकट परिस्थितियों में उन्होंने अपने ईष्ट देवताओं का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गईं। बर्बर दुश्मन सेना ने उन्हें बहुत ढूंढ़ा परन्तु रानी कहीं भी नहीं मिली थीं। नदी के किनारे एक विचित्र रंग की पत्थर की शिला है, जिसे चित्रशिला कहा जाता है। इस सम्बंध में धार्मिक मान्यता है कि इसमें त्रिदेव भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। हिन्दू धर्म साहित्य पुराणों के अनुसार नदी किनारे वट वृक्ष की छाया में ब्रह्मर्षि ने एक पांव पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर कर तपस्या की थी तब प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तत्कालीन समय के देवताओं के अभियंता भगवान विश्वकर्मा को बुलाकर इस रंगबिरंगी अद्भुत शिला का निर्माण करवाया था और उसी शीला पर बैठकर ऋषि को मनवांछित वरदान दिया था।
स्थानीय उत्तराखंडी मान्यताओं में कुछ लोग इस शिला को जियारानी का घाघरा कह कर भी पुकारते हैं। जियारानी को यह स्थान बहुत प्रिय था। उन्होंने यहीं अपना बाग लगाया था और यहीं उन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। जियारानी अपने अस्तित्व, सतीत्व की रक्षा करते हुए सदा के लिए चली गईं। तब से जियारानी की स्मृति में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है। कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है। कुमाऊं क्षेत्र के साथ सम्पूर्ण उत्तराखण्ड के क्षत्रिय–राजपूत आज भी भारतीय वीरांगना नारी जियारानी पर बेहद गर्व करते हैं, उनकी स्मृति में सम्पूर्ण भारत में दूर-दूर बसे उनके कत्यूरी वंशज प्रतिवर्ष यहां आते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं। उत्तराखण्ड की कड़ाके की ठंड–सर्दी में भी पूरी रात माहौल भक्तिमय रहता है।