मकर संक्रांति एक प्राचीन हिंदू त्योहार है, जो हर साल 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन को सूर्य देवता की पूजा और उत्तरायण के प्रारंभ का प्रतीक माना जाता है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में इसे अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है।
रानीबाग (नैनीताल के पास) एक सुंदर और शांत स्थान है, जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है। रानीबाग के पास ही जिया रानी मंदिर स्थित है, जो एक प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। इस मंदिर का संबंध जिया रानी नामक एक वीर और साहसी रानी से है, जिनकी कथाएं स्थानीय लोकगीतों और कहानियों में सुनाई जाती हैं।
जिया रानी मेला हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित किया जाता है। यह मेला धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व का है। मेले में स्थानीय लोग और पर्यटक बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। यहां तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम, पारंपरिक भोजन, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी होती है।
यह स्थान न केवल धार्मिक श्रद्धा के लिए बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता के लिए भी जाना जाता है। यदि आप इस मेले और स्थान का अनुभव करना चाहते हैं, तो मकर संक्रांति के समय रानीबाग आना एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है।

उत्तरायणी मेला उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख लोक उत्सव है, जो विशेष रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। यह मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होता है और एक सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यावसायिक आयोजन है।
रानीबाग, जिला नैनीताल में उत्तरायणी मेला भी इसी परंपरा का हिस्सा है। इस मेले में स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों की भीड़ होती है।
मेले की मुख्य विशेषताएं:
धार्मिक अनुष्ठान: मेले की शुरुआत पवित्र नदी में स्नान और पूजा-अर्चना से होती है। लोग गंगा, सरयू, कोसी और अन्य नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं।
स्थानीय उत्पाद और हस्तशिल्प: मेले में कुमाऊं क्षेत्र के पारंपरिक उत्पाद जैसे ऊनी कपड़े, हस्तशिल्प, गहने और अन्य स्थानीय सामान की बिक्री होती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम: स्थानीय लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक संगीत का आयोजन किया जाता है। यह कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है।
खानपान: मेले में स्थानीय व्यंजन जैसे झोली-भात, भट्ट की चुरकानी, और मंडवे की रोटी आदि का आनंद लिया जा सकता है।
मेलजोल का अवसर: यह मेला एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहां लोग अपने रिश्तों को मजबूत करते हैं और नई मित्रताएं बनाते हैं।

इतिहास और महत्व:
उत्तरायणी मेला उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह मेला न केवल धार्मिक बल्कि व्यावसायिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। रानीबाग जैसे क्षेत्रों में यह मेले स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं और कुमाऊं की समृद्ध संस्कृति को संरक्षित करते हैं।


उत्तराखण्ड राज्य में जियारानी की गुफा के बारे में एक कथा
किवदंती प्रचलित है कि कत्यूरी राजा पृथ्वीपाल उर्फ़ प्रीतमदेव की पत्नी रानीजिया यहां चित्रेश्वर महादेव के दर्शन करने आई थीं। वह बेहद सुन्दर थी ही जैसे ही रानी नहाने के लिए गौला नदी में पहुंची तो वैसे ही आक्रांताओं की दुश्मन सेना ने वहां घेरा डाल दिया। जियारानी महान शिवभक्त और पवित्र पतिभक्त महिला थी। विकट परिस्थितियों में उन्होंने अपने ईष्ट देवताओं का स्मरण किया और गौला नदी के पत्थरों में ही समा गईं। बर्बर दुश्मन सेना ने उन्हें बहुत ढूंढ़ा परन्तु रानी कहीं भी नहीं मिली थीं। नदी के किनारे एक विचित्र रंग की पत्थर की शिला है, जिसे चित्रशिला कहा जाता है। इस सम्बंध में धार्मिक मान्यता है कि इसमें त्रिदेव भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। हिन्दू धर्म साहित्य पुराणों के अनुसार नदी किनारे वट वृक्ष की छाया में ब्रह्मर्षि ने एक पांव पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर कर तपस्या की थी तब प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तत्कालीन समय के देवताओं के अभियंता भगवान विश्वकर्मा को बुलाकर इस रंगबिरंगी अद्भुत शिला का निर्माण करवाया था और उसी शीला पर बैठकर ऋषि को मनवांछित वरदान दिया था।
स्थानीय उत्तराखंडी मान्यताओं में कुछ लोग इस शिला को जियारानी का घाघरा कह कर भी पुकारते हैं। जियारानी को यह स्थान बहुत प्रिय था। उन्होंने यहीं अपना बाग लगाया था और यहीं उन्होंने अपने जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। जियारानी अपने अस्तित्व, सतीत्व की रक्षा करते हुए सदा के लिए चली गईं। तब से जियारानी की स्मृति में यह स्थान रानीबाग के नाम से विख्यात है। कुमाऊं के प्रवेश द्वार काठगोदाम स्थित रानीबाग में जियारानी की गुफा का ऐतिहासिक महत्व है। कुमाऊं क्षेत्र के साथ सम्पूर्ण उत्तराखण्ड के क्षत्रिय–राजपूत आज भी भारतीय वीरांगना नारी जियारानी पर बेहद गर्व करते हैं, उनकी स्मृति में सम्पूर्ण भारत में दूर-दूर बसे उनके कत्यूरी वंशज प्रतिवर्ष यहां आते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं। उत्तराखण्ड की कड़ाके की ठंड–सर्दी में भी पूरी रात माहौल भक्तिमय रहता है।
